TROVENZA

माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। अधोमुख त्रिभुज के शिखर पर स्थापित माया देवी के नाम पर ही हरिद्वार का प्राचीन नाम मायापुरी पड़ा। सती की नाभि इसी स्थल पर गिरी थी। सिद्ध पीठ के दर्शन के लिए वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

 पिता द्वारा पति के अपमान से क्षुब्ध माता सती ने यज्ञअग्नि में प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था । कालांतर में शिव सती के विरह में उनकी देह को कंधे पर उठाए फिर रहे थे तब नारायण ने उन्हें शोक मुक्त करने के लिए सती की देह के अपने सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जहाँ जहाँ माता के शरीर के टुकड़े गिरे वहां वहां शक्ति पीठ स्थापित हैं, इस स्थल पर सती की नाभि गिरी, वही स्थल माया देवी के नाम से विख्यात है।

चूंकि हरिद्वार में भगवती की नाभि गिरी थी, अत: इस स्थल को ब्रह्मांड का केंद्र भी माना जाता है। हरिद्वार की रक्षा के लिए एक अद्भुत त्रिकोण विद्यमान है। इस त्रिकोण के दो बिंदु पर्वतों पर मनसा और चंडी के रूप में स्थित है। त्रिकोण उल्टा है और उसका शिखर धरती पर है। उसी अधोमुख शिखर पर भगवती माया आसीन हैं। माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण डाकिनी, शाकिनी, पिशाचिनी आदि अला बलाओं से तीर्थ की रक्षा करती हैं।

हिन्दू पुराणों के अनुसार सात ऐसी पुरियों अर्थात नगरों का निर्माण किया गया है, जहां इंसान को मुक्ति प्राप्त होती है।

“ अयोध्या-मथुरामायाकाशीकांचीत्वन्तिका, पुरी द्वारावतीचैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।“

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